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NCERT Solutions for Class 10th History

 

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Chapter Chapter 3. भारत में राष्ट्रवाद

परीक्षा-उपयोगी प्रश्नोत्तर

 

 

 

 

प्रश्न - सत्याग्रह का मूलमंत्र क्या था ? 

उत्तर:

(i) अहिंसा के द्वारा किसी को भी जीता जा सकता है |

(ii) संघर्ष में अंततः सत्य की ही जीत होती है।

(iii) आपका संघर्ष अन्याय के खिलाफ है |

(iv) उत्पीड़क से मुकाबला के लिए शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं है | 

(v) गांधीजी का विश्वास था की अहिंसा का यह धर्म सभी भारतीयों को एकता के सूत्र
में बाँध सकता है।

प्रश्न - सभी सामाजिक समूह स्वराज की अमूर्त अवधारणा से प्रभावित नहीं थे | क्यों ? 

उत्तर : सभी सामाजिक समूह स्वराज की अमूर्त अवधारण से प्रभावित नहीं थे यह बात बिलकुल सत्य है जिसके निम्नलिखित कारण थे |

(i) देश के हर वर्ग और सामाजिक समूहों पर उपनिवेशवाद का एक जैसा असर नहीं था | उनके अनुभव भी अलग-अलग थे | 

(ii) अलग-अलग समूहों के लिए स्वराज के मायने भी भिन्न थे और सबके अपने हित थे | 

(iii) बहुत से पढ़े-लिखे भारतीय और अमीर लोग सीधे तौर पर अंग्रेजों से जुड़े थे, जिनके अपने-अपने हित थे | उनका स्वराज व स्वतंत्रता के प्रति रुख उदासीन था | 

(iv) किसानों की अपनी समस्याएँ थी, जबकि अंग्रेजी सेना में शामिल भारतीय सिपाहियों की भी अपनी समस्याएँ थी |

(v) स्वराज आन्दोलन के लिए इन समूहों को खड़ा करना एक बहुत बड़ी समस्या थी | इनके एकता में भी टकराव के बिंदु निहित थे |    

प्रश्न: गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन के लिए नमक को ही मुख्य हथियार क्यों बनाया ? 

उत्तर : गाँधी जी जानते थे कि नमक एक ऐसी वस्तु है जो भारत के सभी लोग उपयोग करते हैं चाहे वे अमीर हो गरीब हो 

प्रश्न : इतिहास व साहित्य लोककथा व गीत, चित्रों व प्रतिक चिन्हों आदि के प्रयोग ने राष्ट्रवाद में किस प्रकार योगदान दिया ? उदाहरण देकर समझाइए | 

उत्तर : 

प्रश्न : गाँधी इरविन समझौता क्या था ? 

उत्तर : 5 मार्च 1931 को गाँधी जी ने इरविन के साथ एक समझौते पर दस्तखत किए | जिसमें गाँधी जी ने लंदन में होने वाले दुसरे गोलमेज सम्मलेन में हिस्सा लेने पर अपनी सहमति व्यक्त कर दी | इससे पहले कांग्रेस गोलमेज सम्मलेन का बहिष्कार कर चुकीं थी | इसके बदले ब्रिटिश सरकार राजनितिक बंदियों को रिहा करने पर राजी हो गई | गाँधी और इरविन के बीच इस समझौते को गाँधी इरविन समझौता कहा जाता है |
प्रश्न : किन दो उद्योगपतियों के नेतृत्व में उद्योगपतियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर औपनिवेशिक नियंत्रण का विरोध किया ?

उत्तर : पुरुषोत्तम दास, ठाकुर दास और जी.डी. बिडला | 

प्रश्न : फिक्की की स्थापना कब हुई ?

उत्तर : फिक्की की स्थापना 1927 ई० में हुई | 

प्रश्न : भारतीय व्यापारी और उद्योगपतियों ने औपनिवेशिक नीतियों का विरोध क्यों किया ? उनकी क्या माँगे थी ?

उत्तर : पहले विश्वयुद्ध के दौरान भारतीय व्यापारियों और उद्योगपतियों ने भारी मुनाफा कमाया था और वे ताकतवर हो चुके थे । अपने कारोबार को फैलने के लिए उन्होंने ऐसी औपनिवेशिक नीतियों का विरोध किया जिनके कारण उनकी व्यावसायिक गतिविधियों में रुकावट आती थी।

उनकी माँगे निम्नलिखित थी |

(i) वे विदेशी वस्तुओं के आयात से सुरक्षा चाहते थे |

(ii) रुपया-स्टर्लिंग विदेशी विनिमय अनुपात में बदलाव चाहते थे | 

प्रश्न : भारतीय व्यापारियों और उद्योगपतियों ने औपनिवेशिक नीतियों के विरोध में कौन-कौन से कदम उठाए | 

उत्तर : भारतीय व्यापारियों और उद्योगपतियों ने औपनिवेशिक नीतियों के विरोध में निम्नलिखित कदम उठाए :

(i) व्यावसायिक हितों को संगठित करने के लिए उन्होंने 1920 में भारतीय औद्योगिक एवं व्यावसायिक कांग्रेस (इंडियन इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल कांग्रेस) और 1927 में भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग परिसंघ (पेफडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर ऑप़फ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री-फिक्की) का गठन किया।

(ii) उद्योगपतियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर औपनिवेशिक नियंत्रण का विरोध किया | (ii) पहले सिविल नाफरमानी आंदोलन का समर्थन किया।

(iii) उन्होंने आंदोलन को आर्थिक सहायता दी और आयातित वस्तुओं को खरीदने या बेचने से इनकार कर दिया।

(iv) ज्यादातर व्यवसायी स्वराज को एक ऐसे युग के रूप में देखते थे जहाँ कारोबार पर औपनिवेशिक पाबंदियाँ नहीं होंगी और व्यापार व उद्योग निर्बाध ढंग से फल-फूल सकेंगे।

प्रश्न : भारतीय उद्योगपतियों द्वारा व्यावसायिक हितों को संगठित करने के लिए किन दो व्यावसायिक संगठनों का गठन किया ? 

उत्तर : 

(i) भारतीय औद्योगिक एवं व्यावसायिक कांग्रेस (इंडियन इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल कांग्रेस) का 1920 में और

(ii) 1927 में भारतीय वाणिज्य एवं उद्योग परिसंघ (पेफडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर ऑप़फ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री-फिक्की)

प्रश्न : गोलमेज सम्मलेन के विफलता के बाद व्यावसायिक संगठनों का उत्साह मंद क्यों पड़ गया ?

उत्तर : गोलमेज सम्मलेन के विफलता के बाद व्यावसायिक संगठनों का उत्साह मंद पड़ने के निम्नलिखित कारण थे | 

(i) उन्हें उग्र गतिविधियों का भय था।

(ii) वे लंबी अशांति की आशंका से भग्न (आशंकित) थे |

(iii) कांग्रेस के युवा सदस्यों में समाजवाद के बढ़ते प्रभाव से डरे हुए थे।

प्रश्न : औद्योगिक श्रमिक वर्ग ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में नागपुर के अलावा और कहीं भी बहुत बड़ी संख्या में हिस्सा नहीं लिया। कारण बताइए |

उत्तर : उस समय बड़े-बड़े उद्योगपति कांग्रेस के नजदीक आ रहे थे, जिससे मजदुर वर्ग कांग्रेस से छिटकने लगे थे | मजदूर कांग्रेस से देश में समाजवादी नीतियाँ चाहते थे परन्तु उद्योगपति कांग्रेस के युवा समाजवादी नेताओं के प्रभाव से डरे हुए थे | कांग्रेस अपने कार्यक्रम में मजदूरों की माँगों को समाहित करने में हिचकिचा रही थी। कांग्रेस को लगता था कि इससे उद्योगपति आंदोलन से दूर चले जाएँगे और साम्राज्यवाद विरोधी ताकतों में फूट पडे़गी।

प्रश्न : सविनय अवज्ञा आन्दोलन (नमक सत्याग्रह आन्दोलन) में औरतों की भूमिका का वर्णन कीजिए |

Or (अथवा) 

राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान बहुत सारी औरतें अपनी जिंदगी में पहली बार अपने घर से निकलकर सार्वजनिक क्षेत्र में आई थीं। इस कथन की पुष्टि कीजिए | 

उत्तर : इस आन्दोलन में औरतों ने बड़े पैमाने पर हिस्सा लिया। गांधीजी के नमक सत्याग्रह के दौरान हजारों औरतें उनकी बात सुनने के लिए घर से बाहर आ जाती थीं। उन्होंने जुलूसों में हिस्सा लिया, नमक बनाया, विदेशी कपड़ों व शराब की दुकानों की पिकेटिंग की। बहुत सारी महिलाएँ जेल भी गईं। शहरी इलाकों में ज्यादातर ऊँची जातियों की महिलाएँ सक्रिय थीं जबकि ग्रामीण इलाकों में संपन्न किसान परिवारों की महिलाएँ आंदोलन में हिस्सा ले रही थीं। गाँधी के आह्वान के बाद औरतों को राष्ट्र की सेवा करना अपना पवित्र दायित्व दिखाई देने लगा था।

प्रश्न : औरतों के विषय में गाँधी जी का क्या मानना था ?

उत्तर: गाँधीजी का मानना था कि घर चलाना, चूल्हा-चौका सँभालना, अच्छी माँ व अच्छी पत्नी की भूमिकाओं का निर्वाह करना ही औरत का असली कर्त्तव्य है। इसीलिए लंबे समय तक कांग्रेस संगठन में किसी भी महत्त्वपूर्ण पद पर औरतों को जगह देने से हिचकिचाती रही। कांग्रेस को उनकी प्रतीकात्मक उपस्थिति में ही दिलचस्पी थी।

 

 

 

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